आरंग: छत्तीसगढ़ के सरकारी स्कूलों में प्रार्थना सभा के दौरान गायत्री मंत्र सहित अन्य मंत्रों के अनिवार्य पाठ संबंधी आदेश को लेकर राजनीतिक बयानबाजी तेज हो गई है। इस मुद्दे पर पूर्व कैबिनेट मंत्री डॉ. शिवकुमार डहरिया ने राज्य सरकार की आलोचना करते हुए कहा कि शिक्षा के मंदिरों को राजनीति और धार्मिक प्रयोगशाला नहीं बनाया जाना चाहिए।
डॉ. डहरिया ने कहा कि शिक्षा व्यवस्था का मुख्य उद्देश्य विद्यार्थियों को ज्ञान, वैज्ञानिक सोच और संवैधानिक मूल्यों से जोड़ना है। सरकार को स्कूलों में शिक्षकों की कमी दूर करने, शिक्षा की गुणवत्ता सुधारने और विद्यार्थियों के भविष्य को बेहतर बनाने पर ध्यान देना चाहिए। उन्होंने कहा कि ऐसा प्रतीत होता है कि सरकार को पाठ्यपुस्तकों और शिक्षा व्यवस्था की चुनौतियों से अधिक प्रार्थना-पाठ की चिंता है।
उन्होंने कहा कि भारत का संविधान प्रत्येक नागरिक को अपनी आस्था और धर्म का पालन करने की स्वतंत्रता प्रदान करता है। ऐसे में किसी विशेष धार्मिक मंत्र को सरकारी संस्थानों में अनिवार्य करना संविधान की धर्मनिरपेक्ष भावना के अनुरूप नहीं माना जा सकता। डॉ. डहरिया ने कहा कि सरकारी स्कूल सभी वर्गों और समुदायों के बच्चों के लिए समान अवसर और समावेशी वातावरण प्रदान करने वाले संस्थान होने चाहिए।
पूर्व मंत्री ने आरोप लगाया कि केंद्र और राज्य की भाजपा सरकारें शिक्षा जैसे संवेदनशील क्षेत्र का भी राजनीतिक लाभ के लिए उपयोग करने का प्रयास कर रही हैं। उन्होंने कहा कि बच्चों के हाथों में बेहतर शिक्षा, आधुनिक ज्ञान और विकास के अवसर होने चाहिए, न कि ऐसी व्यवस्थाएं जिनसे समाज में अनावश्यक वैचारिक विभाजन पैदा हो।
डॉ. डहरिया ने राज्य सरकार से उक्त आदेश पर पुनर्विचार करने की मांग करते हुए कहा कि सभी वर्गों की भावनाओं का सम्मान करते हुए ऐसा वातावरण बनाया जाए, जहां सरकारी स्कूल समावेशिता, समानता और संवैधानिक मूल्यों के प्रतीक बने रहें। उन्होंने कहा कि शिक्षा को राजनीति और धार्मिक ध्रुवीकरण से दूर रखना ही लोकतंत्र, समाज और विद्यार्थियों के भविष्य के हित में होगा।