छुईखदान: छत्तीसगढ़ की ऐतिहासिक 14 रियासतों में से एक छुईखदान अपनी एक बेहद खास और अनूठी दशहरा परंपरा के लिए आज भी देश भर में कौतूहल का विषय बनी हुई है। जहाँ पूरे देश में विजयादशमी पर रावण के गगनचुंबी पुतलों को अग्नि के हवाले किया जाता है, वहीं छुईखदान में आज भी सदियों पुरानी रियासत कालीन परंपरा के अनुसार मिट्टी से बने रावण का ''शिरोच्छेद'' (तलवार से सिर काटना) किया जाता है। इस वर्ष भी विजयादशमी के पावन पर्व पर राज परिवार की मौजूदगी में इस भव्य और ऐतिहासिक रस्म का निर्वहन किया जाएगा। वैष्णव धर्म लंबी छुईखदान रियासत की नगरी में दशहरा पर्व की शुरुआत लगभग वर्ष 1750 से 1780 के बीच प्रथम राजा महंत रूप दास जी के शासनकाल में हुई थी। तब से लेकर आज तक पीढ़ी-दर-पीढ़ी इस परंपरा का निर्वहन किया जा रहा है।
स्थानीय कुंभकार गढ़ते हैं स्वरूप
इस उत्सव की सबसे बड़ी विशेषता इसकी निर्माण प्रक्रिया है। स्थानीय कुंभकारों द्वारा पूरी श्रद्धा के साथ रावण का पुतला मिट्टी से तैयार किया जाता है। रावण बनाने का स्थान ''नवागांव मार्ग'' आज भी अपरिवर्तित है। विजयादशमी से ठीक दो दिन पहले इसका निर्माण कार्य शुरू होता है। मिट्टी के इस स्वरूप को तैयार करने के बाद, संहार के समय तक इसकी बकायदा कड़ी सुरक्षा की जाती है।
केवल राजा को है संहार का अधिकार
शास्त्रों और रियासत के नियमों के अनुसार, छुईखदान में रावण वध करने का अधिकार केवल राजा को ही प्राप्त है। अंतिम राजा ऋतुपर्ण किशोर दास जी के स्वर्गवास के बाद, उनके एकमात्र पुत्र घनश्याम किशोर दास जी ने इस परंपरा को आगे बढ़ाया था। उनके भी निधन के पश्चात, पिछले सात वर्षों से राज परिवार के उत्तराधिकारी प्रतिनिधि राजा गिरिराज किशोर दास द्वारा इस दायित्व का निर्वहन किया जा रहा है।
शाही सवारी के साथ रावण भाटा प्रस्थान
विजयादशमी के दिन राजा गिरिराज किशोर दास अपने अनुज देवराज किशोर दास और राज पुरोहित के साथ शाही सवारी में विराजमान होकर निकलते हैं। इस दौरान भजन मंडली द्वारा भजन गायन करते हुए पूरा काफिला आगे बढ़ता है। मान्यता है कि भगवान श्रीराम ने रावण को जलाया नहीं था, बल्कि उसके नाभि में स्थित अमृत कुंभ को सुखाकर उसका वध किया था। इसी शास्त्रोक्त परंपरा का पालन करते हुए। रावण भाटा पहुंचकर सबसे पहले मंत्रोच्चार के साथ भगवान राम की विशेष पूजा की जाती है।
अमृत रूपी मिट्टी
रियासत के प्रमुख (श्रीराम के प्रतिनिधि के रूप में) रावण का शिरोच्छेद करते हैं। वह तलवार की नोक से रावण के नाभि की मिट्टी को निकालकर उसे ''अमृत'' मानकर अपने पास सुरक्षित रख लेते हैं। हनुमान के निशान (प्रतीक) को वैष्णव संप्रदाय के निंबार्क मत का प्रतीक माना जाता है। हनुमान के निशान को धनुष बाण का प्रतीक मानकर ही रावण भाटा की ओर प्रस्थान किया जाता है। विजयादशमी के अगले दिन राजमहल में एक दरबार सजता था, जिसकी स्मृति आज भी बुजुर्गों के दिलों में ताजा है। इस दरबार में दूर-दराज से लोगों की भारी भीड़ उमड़ती थी।