January 13, 2026


क्या महिलाएं कर सकती हैं अंतिम संस्कार? जानें क्या कहते हैं धर्मशास्त्र

भारतीय परंपराओं में अंतिम संस्कार (दाह संस्कार) एक अत्यंत महत्वपूर्ण और संवेदनशील कर्मकांड है। सदियों से यह माना जाता रहा है कि अंतिम संस्कार केवल पुरुष ही करते हैं, खासकर पुत्र। लेकिन, क्या यह नियम हर परिस्थिति में लागू होता है? क्या महिलाएं अपने परिवार वालों का अंतिम संस्कार नहीं कर सकतीं? आइए जानते हैं गरुड़ पुराण और अन्य धर्मशास्त्र इस विषय पर क्या कहते हैं।

शास्त्रों के मुताबिक, यह केवल एक सामाजिक परंपरा और सुविधा का हिस्सा रहा है। आज के समय में, अगर कोई महिला अपने प्रियजन को मुखाग्नि देना चाहती है और सक्षम है, तो उसे यह अधिकार है। यह आत्मा की शांति और परिवार के भावनात्मक जुड़ाव का मामला है, जिसमें लिंगभेद की कोई जगह नहीं होनी चाहिए।

परंपरा और मान्यताएं सामान्यत
भारतीय समाज में पुत्र या परिवार के सबसे बड़े पुरुष सदस्य को ही मुखाग्नि देने का अधिकार दिया गया है। इसके पीछे कई कारण बताए जाते हैं:

सामाजिक भूमिका: पहले के समय में महिलाएं घर-परिवार की देखभाल करती थीं और उन्हें कमजोर माना जाता था, इसलिए उन्हें श्मशान घाट पर जाने से रोका जाता था।

भावनात्मक कारण: यह माना जाता था कि महिलाएं पुरुषों की तुलना में अधिक भावुक होती हैं और वे अपने प्रियजन को अग्नि में जलता देखकर स्वयं को संभाल नहीं पाएंगी, जिससे अनुष्ठान में बाधा आ सकती है।

कर्मकांडीय शुद्धता: कुछ मान्यताओं के अनुसार, मासिक धर्म के कारण महिलाओं को कुछ धार्मिक अनुष्ठानों से दूर रखा जाता था, और अंतिम संस्कार भी उन्हीं में से एक था।

क्या कहता है गरुड़ पुराण?
गरुड़ पुराण के मुताबिक, जो मृत्यु के बाद के संस्कारों और आत्मा की यात्रा का विस्तृत वर्णन करता है, सीधे तौर पर महिलाओं को अंतिम संस्कार करने से रोकता नहीं है। हालांकि, यह स्पष्ट रूप से पुत्र या पुरुष रिश्तेदार को मुखाग्नि देने की बात करता है। गरुड़ पुराण में कहीं भी यह नहीं कहा गया है कि महिलाएं अंतिम संस्कार नहीं कर सकती हैं। बल्कि यह उस समय की सामाजिक व्यवस्था और सुविधा के अनुसार पुरुषों की भूमिका को अधिक महत्व देता है।


Related Post

Advertisement

Tranding News

Get In Touch