June 10, 2026


Chaturmas 2026: कब से शुरू होगा चातुर्मास? जानें तिथि, महत्व और शुभ कार्यों पर रोक

सनातन धर्म में चातुर्मास को साधना, भक्ति और आत्मसंयम का विशेष काल माना जाता है। यह 4 महीनों की पवित्र अवधि है, जिसका प्रारंभ देवशयनी एकादशी से और समापन देवउठनी एकादशी पर होता है। मान्यता है कि इस दौरान भगवान विष्णु योग निद्रा में चले जाते हैं और दुनिया की कमान शिव जी के हाथों में होती है। जानिए इस साल चातुर्मास का प्रारंभ कब से होने जा रहा है और इसका महत्व क्या है।  

कब से शुरू होगा चातुर्मास 2026?

हिंदू पंचांग के अनुसार, साल 2026 में चातुर्मास की शुरुआत 25 जुलाई, शनिवार को आषाढ़ शुक्ल पक्ष की एकादशी से होगी। यह पवित्र अवधि करीब 119 दिनों तक चलेगी और 20 नवंबर, शुक्रवार को कार्तिक शुक्ल पक्ष की प्रबोधिनी एकादशी के दिन समाप्त होगी। धर्म ग्रंथों में वर्णित है कि इसी दिन भगवान विष्णु योग निद्रा से जागते हैं।

चातुर्मास में कौन-कौन से माह शामिल?

'चातुर्मास' एक संस्कृत शब्द है, जिसका अर्थ है चार महीने। इस अवधि में मुख्य रूप से श्रावण, भाद्रपद, आश्विन और कार्तिक माह शाामिल होते हैं। 

भगवान विष्णु की योग निद्रा

पौराणिक कथाओं के अनुसार, देवशयनी एकादशी के दिन भगवान विष्णु राजा बलि के आग्रह पर पाताल लोक में जाकर योग निद्रा में लीन हो जाते हैं। 4 महीने बाद देवउठनी एकादशी पर उनके जागने की मान्यता है। इसके बाद सृष्टि के संचालन का भार उन पर होता है।

चातुर्मास का धार्मिक-आध्यात्मिक महत्व

  1. हिंदू धर्म में इन महीनों को आध्यात्मिक साधना और आत्मचिंतन का सबसे महत्वपूर्ण समय माना गया है और सांसारिक गतिविधियों की बजाए धार्मिक कार्यों पर अधिक ध्यान दिया जाता है।
  2. मान्यता है कि जब सृष्टि के पालनकर्ता भगवान विष्णु विश्राम अवस्था में रहते हैं, तब विवाह, गृह प्रवेश, मुंडन, जनेऊ संस्कार और नए व्यापार की शुरुआत जैसे शुभ कार्य नहीं किए जाते। चातुर्मास, मांगलिक कार्यों के लिए वर्जित काल माना जाता है।
  3. जप, तप, व्रत, ध्यान के लिए चातुर्मास को अत्यंत फलदायी बताया है। मान्यता है कि इस अवधि में किए गए आध्यात्मिक कार्यों का पुण्य सामान्य दिनों की तुलना में अधिक प्राप्त होता है। इसलिए इन महीनों में विशेष धार्मिक अनुष्ठान कराए जाते हैं।

छोटे जीव-जंतुओं की रक्षा

चातुर्मास वर्षा ऋतु के दौरान आता है। इस समय साधु-संत और ऋषि-मुनि लंबी यात्राएं छोड़कर एक ही स्थान पर रहकर साधना करते हैं। इसे अवधि को वर्षावास या चौमासा के नाम से भी जाना जाता है। साधना के साथ इसका उद्देश्य ऐसे छोटे जीव-जंतुओं की रक्षा करना है, जिनकी पैरों के नीचे आने से कुचलकर मर सकते हैं।


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