राजनांदगांव : राजनांदगांव संस्कारधानी के विद्वान कहते है और कलमधारी भी उस बात को लेकर की कोई भी काम जिसमे नियत साफ न हो तो उसमे दोहरे चरित्र की भूमिका बलवत होती है। सीधे तौर पर कहे तो "हाथी के दांत" दिखाने के ओर खाने के और होते है। आजकल कहे तो इसी परंपरा की शुरुवात का ही लोहा हर जगह माना जाने लगा है । खास कर तब जब सैय्या भये कोतवाल तो डर काहे का का इसका सीधा मतलब यह है कि नियमो का पालन कराने की ज़िम्मेदारी जिन खंभों के पास है और उस पर टकटकी आंखे लगा कर सही और गलत की आवाज बनने वाला स्थंभ को ही घून लग जाए तो ववस्था का सद्भावना मे तब्दील होना कोई अचरज की बात नहीं।
शहर मे बुद्धिजीवी और चिंतक लोगो के बीच एक मैच को लेकर काफी चर्चा हो रही है की कोरोना काल के गर्भ से उपजे एक युक्ति ने ऐसी योजना का पदार्पण करवाया जिससे ववस्थाओ का ताल मेल भी बैठाया जा सके और साल भर की उगाही का कोटा भी मैनेज किया जा सके। बिना भरोसे निष्पक्षता के सद्भावना प्रेम को छलकाया जा सके उसी की जुगत में मजबूत स्तंभ भी लगे हुए है ,कहते है खेल तो खिलाने और दर्शकों को दिखाने मात्र का नही है बल्कि खेल खेल मे आखिर तेल भी निकालने की तैयारी का खाका भी पहले से तैयार है। बस अब किसी को मैदान मे खेलना है और किन्ही को मैदान से खेलना है।