राजनंदगांव । खाटू श्याम लखदातार सेवा समिति द्वारा पावन पुरुषोत्तम मास में आयोजित पंच दिवसीय श्री श्याम चरित्र कथा के तृतीय दिवस खाटू धाम गायत्री विद्यापीठ के विशाल प्रांगण में श्री श्याम चरित्र कथा का रसपान कराते हुए अंचल के सुप्रसिद्ध भगवताचार्य पंडित अर्पित भाई शर्मा ने कहा कि मानव जीवन के लिए पावन पुरुषोत्तम मास में श्री श्याम चरित्र कथा श्रवण करने का सर्वोकृष्ट लाभ है । मानव जीवन को माचिस की तीली बताते हुए आचार्य श्री ने कहा कि जीवन में माता-पिता , भाई - बहन , पति - पत्नी इत्यादि रिश्ते प्रेम जाल में फंसा कर रखते हैं । माचिस की जलती तीली के आखिरी छोर तक पहुंचने की पूर्व तीली छोड़नी पड़ती है, प्रेम की तीली जला ले पर हाथ जलने के पहले त्याग कर देना उचित होता है । प्रेम सर्वदा सर्व व्यापक है । कथा प्रसंग को आगे बढ़ते हुए पंडित अर्पित भाई ने कहा कि पावन पुरुषोत्तम मास की रचना भगवान विष्णु ने राक्षसराज हिरण्यकश्यप का वध करने के लिए किया था , हिरण कश्यप को वरदान था कि वह 12 महीने के किसी माह में भी ना मारे । अतः एक नए माह का उदय किया गया । मनुष्य मात्र का परम धर्म है कि वह प्रभु से निश्चल - निष्कपट भक्ति करें ,भक्ति में कुछ प्राप्त करने की इच्छा ना करें । हृदय भगवान की पूर्ण सेवा एवं कथा में लग जावे तो ज्ञान भक्ति है। कर्मयोगी के पास कर्म फल होता है, जब भक्त भगवान को पुकारता है तो भगवान दौड़े चले आते हैं भक्त प्रहलाद की पुकार सुनकर भगवान नरसिंह अवतार लेकर प्रकट हुए ।
कथा व्यास पंडित अर्पित भाई ने कहा कि व्यक्ति भक्ति कर्म एवं ज्ञान योग को समझ जावे तो उसके जीवन में अखंड ज्योति प्रज्वलित हो जाती है भक्ति की अलौकिक महिमा है । भक्ति जब अपने चरम पर पहुंच जाती है तब उसमे अमृत रूपी दूध डालकर परमेश्वर प्रकट हो जाते हैं । भक्ति यदि भोजन में प्रकट हो जाए तो वह प्रसाद बन जाती है । प्रेम की महिमा बताते हुए उन्होंने कहा कि प्रत्येक व्यक्ति को सभी प्राणियों , जीव - जंतु , जड़ - चेतन से प्रेम करना चाहिए । बंद सिग्नल का उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि चौराहे पर लगा सिग्नल जब बंद होता है तो हमें अस्थाई रूप से रुकना पड़ता है । इस तरह जीवन में दुख आ जाए तो घबराना नहीं चाहिए । दुख आने से मन कुंठित हो जाता है , पर यह अस्थाई होता है । परमेश्वर की शरण में जाने से घना अंधेरा दूर हो जाता है और सिग्नल हरा होते ही हमारा जीवन भी हराभरा हो जाता है ,थोड़े समय के दुख टल जाएंगे अंधेरा 24 घंटे नहीं रहता ।
जंगल में आग लगने पर बाहर के प्राणी जल जाते है , बिलो में रहने वाले प्राणी का बाल भी बांका नहीं होता
कथा प्रसंग को आगे बढ़ते हुए कथा व्यास पंडित अर्पित भाई ने पांडु पुत्र भीम के जीवन चरित्र की कथा पर प्रकाश डालते हुए कहा कि धृतराष्ट्र एवं दुर्योधन ने छलपूर्वक पांडवों को वारनावध के मेले में भेजा । तब विदुर जी ने पांडवों को संकेत में एक बात कही कि जब जंगल में आग लगती है तब बाहर के प्राणी जलकर भस्म हो जाते हैं किंतु बिलों में रहने वाले प्राणी का बाल भी बांका नहीं होता । पांचों पांडव अपनी माता कुंती को लेकर वारनावध के मेले में जाते हैं और लाक्षागृह में रुकते है । विदुर जी के विश्वास पात्रों द्वारा लाक्षागृह में गहरी सुरंग बनाई गई । लाक्षागृह में दुर्योधन के दूतों द्वारा आग लगा दी गई तब पांचो पांडव अपनी माता कुंती को लेकर सुरंग से दूसरे जंगल की ओर निकल गए , भीम को छोड़कर बाकी सभी भाई एवं माता कुंती काफी थक गए थे वह आराम करने लगे एवं भीम जंगल का भ्रमण करने निकले । वहीं हिडंब नाम का राक्षस अपनी बहन हिडम्बा के साथ रहता था , उसे मानव मांस की सुगंध आई , उसने अपनी बहन हिडिंबा को मानव का मांस लाने के लिए भेजा । जब हीडंबा जंगल में पहुंची तब वहां उसने बलिष्ठ शरीर के सुंदर व्यक्ति को देखा एवं उस पर मोहित हो गई तथा उसे अपने पति के रूप में स्वीकार किया । भीम द्वारा राक्षस राज हिडिंब का वध किया गया एवं माता कुंती एवं चारों भाइयों के कहने पर हिडिंबा के साथ इस शर्त पर विवाह हुआ कि एक पुत्र होने तक ही भीम उसके साथ जंगल में रहेगा , उसके पश्चात वह अपनी राजधानी लौट जाएगा । समय अनुकूल उनके एक पुत्र का जन्म हुआ जो जन्मते ही किशोरावस्था को प्राप्त हो गया । जिसका नाम घटोत्कच रखा गया , फिर भीम अपनी इंद्रप्रस्थ पूरी पर लौट आए । कुछ समय पश्चात हिडिंबा ने तपस्या करने का निर्णय लेकर घटोत्कच को अपने पिता के पास भेजा । भगवान कृष्ण ने विचार किया कि अब घटोत्कच का विवाह कर देना चाहिए तब उन्हें स्मरण आया कि एक समय
भौमासुर नाम के रक्षस का वध करते हुए मोर नाम के राक्षस का वध किया था तब उसकी एक पुत्री मोरवी थी , उसका वध करने ही वाले थे तब माता कामाख्या प्रकट हुई और कहा कि भविष्य में मोरवी थी उसके गर्भ से एक दिव्य एवं विशिष्ट पुत्र का जन्म होने वाला है । भीम के पुत्र के साथ इसका विवाह होगा और आप इसके ससुर बनेंगे । मोरवी ने प्रण किया था कि उसे बल एवं बुद्धि में जो परास्त करेगा उसी से वह विवाह करेंगी, देवों की वाणी कभी असत्य नहीं होती ।
पौराणिक ग्रन्थ पद्म पुराण के अनुसार खाटू श्याम जी मोरवी के पुत्र है
कथा प्रसंग को आगे बढ़ते हुए कथा व्यास पंडित शर्मा ने कहा कि अनेक देश के राजकुमार एवं दानव मोरवी के पास विवाह का प्रस्ताव लेकर आए किंतु उसे बुद्धि एवं बल में पराजित नहीं कर सके अतः मृत्यु को प्राप्त हुए । घटोत्कच भी विवाह की चाहत लेकर मोरवी के पास पहुंचे और भगवान कृष्ण का ध्यान करते हुए उससे प्रश्न किया बुद्धि में पराजित कर उसे बल में भी पराजित कर दिया । तब मोरबी ने उनसे विवाह करने का प्रस्ताव रखा । तब घटोत्कच ने कहा कि मेरे माता-पिता के समक्ष ही विवाह होगा कथा व्यास ने कहा कि जिन व्यक्तियों के माता-पिता एवं गुरु जीवित हैं उन्हें अपने माता-पिता एवं गुरु की अनुपस्थिति में विवाह नहीं करना चाहिए । घटोत्कच एवं मोरबी का विवाह संपन्न हुआ । समय अनुकूल कार्तिक शुक्ल द्वादशी की मध्य बेला आई , चांद सी शीतलता से प्रकृति महकने लगी , वृक्षों की डालिया नृत्य करने लगी , मोर नाचने लगे , पूरे क्षेत्र में पुष्पों की वर्षा होने लगी , सूर्य रुक गए और हवा में सुगंध महकने लगी । तभी घटोत्कच एवं मोरवी के सुंदर सुशील पुत्र का जन्म हुआ जिसका नाम बर्बरीक रखा गया । जो बाद में भगवान कृष्ण के द्वारा दिए गए वरदान से खाटू श्याम कहलाए । बालक बर्बरीक के जन्म लेते ही कथा स्थल खाटूधाम के पूरे पंडाल में हर्षोल्लास छा गया , बधाइयां बांटी जाने लगी , बाजे बजने लगे और भक्त माता - बहने अपनी खुशियों का इजहार करने के लिए नृत्य करने लगी । बाजेगाजे के साथ खूब उत्सव मनाया गया ।
पंडित अर्पित भाई शर्मा ने कहा कि पद्म पुराण में ही पांडवों के प्रामाणिक कथा का वर्णन है , जिसके अनुसार खाटू श्याम जी , जो बर्बरीक के नाम से जन्मे हैं , वह माता मोरवी के पुत्र हैं ना की अहिल्यवती के । प्रचलित श्री श्याम अखंड ज्योति पाठ पिछले दो - ढाई सौ वर्ष पूर्व लिखा गया है, जिसकी प्रमाणिकता किसी ग्रंथ में नहीं है । कथा कल भी जारी रहेगी ।