राजनांदगांव : यूं ही कोई संस्कारधानी के रूप मे हमारे शहर की पहचान नहीं है, इसके लिए समर्पण, शिष्टाचार और सद्भावना को एक साथ मथा गया। इस तलाश मे की कही से पारदर्शिता का विश्वास तो निकाला जा सके पर सद्भावना के माध्यम से सामंजस्य के जुगत की कठिनाई उत्पन्न ना हो सके जिन्हें उन चार खम्बो में से किसी एक खंभे की वक्त बेवक्त जरूरत पूरी हो सके, ऐसी दानवीर जो दान देने के बाद ढिंढोरा पीटना अच्छे से जानते हैं और किसी मजबूर को भी मदद करने हाथ की कंपकपी कई दिनों तक बनी रहती हो आखिर इतनी उदारता वो भी बिना मतलब के लोगों को खास कर उनको बिल्कुल भी नहीं पच रहा है कि आखिर क्यों आयोजन मे सक्रिय भूमिका अदा करते होंगे ? सद्भावना बनाने का क्रम विगत 4 वर्षों से जारी है ।पर पारदर्शिता और विश्वास है कि सद्भावना से पैदा होने में काफी मशक्कत करनी पड़ रही है यह अलग बात है कि अब डबल इंजन की सरकार के प्रशासनिक नुमाइंदे सद्भावना से विश्वास और पारदर्शिता निकाल पाने में कामयाब होते हैं या नहीं ।
खेल और संस्कारों के नाम से राजनांदगांव शहर दूर तक पहचाना जाता है । यहां की "हांकी और झांकी" की चर्चा सात समुंदर पार भी होती ही होगी तो कोई अचरज की बात नहीं। राजनांदगांव में कलेक्टर रहे जयप्रकाश मौर्य के सूझबूझ का ही नतीजा है कि आज प्रेस, पुलिस, पब्लिक और पॉलिटिशिय जिनका सबका दायित्व समाज मे भिन्न-भिन्न है बावजूद सद्भावना कायम करने की दिशा में सब एकजुट नजर आते हैं और यह तत्कालीन कलेक्टर रहे जयप्रकाश मौर्य के परिकल्पना का ही नतीजा है कि निरंतर यह मैच अब प्रशासन की मौजूदगी और अध्यक्षता में हो रहे हैं। सबसे बड़ी बात है कि इस तरह के भव्य आयोजन में जहां सद्भावना और उत्साह दोनों ही अपना जज्बा लिए हुए होता है तो आखिर क्या कारण है कि इसमें पारदर्शिता की कमी की आवाज़ शुरुआत दौर से ही उठते चली आ रही है। लगता है कि अब समय आ गया कि पारदर्शिता के विश्वास को बनाए रखने के मिथक को तोड़ने का समय उपयुक्त है और सबसे सरल सजग और निर्भीक कलेक्टर संजय अग्रवाल कहीं ना कहीं इस पारदर्शिता को बनाए रखने की दिशा की शुरुआत करेंगे । जिसमें पत्रकार वार्ता सद्भावना मैच के पहले और पूर्व वर्षों के आय और व्यय की जानकारी भी सार्वजनिक की जा सके तब यह विश्वासपूर्ण सद्भावना का आयोजन सफल माना जाएगा अन्यथा सवाल तो उठते ही रहेंगे जिसका जवाब प्रशासन को ही मुहैया कराने होंगे।