राजनांदगांव: शिक्षित बेरोजगारों को स्वरोजगार उपलब्ध कराने के उद्देश्य से शुरू की गई मुख्यमंत्री स्वावलंबन योजना नगर निगम की उदासीनता और कथित कब्जों की भेंट चढ़ती नजर आ रही है। करोड़ों रुपये खर्च कर बनाई गई दर्जनों दुकानें या तो वर्षों से बंद पड़ी हैं, खंडहर में बदल रही हैं या फिर उन पर राजनीतिक रसूख रखने वालों के कब्जे के आरोप लग रहे हैं। दूसरी ओर, पात्र बेरोजगार आवंटन के इंतजार में निगम के चक्कर काट रहे हैं। शहर के लखोली, रानी सागर, नया बस स्टैंड, मोहारा और सागरपारा, चौपाटी रोड, ढाबा रोड में स्वावलंबन योजना के तहत दर्जनों दुकानें बनाई गई थीं। लखोली में करीब 15 दुकानों में आज तक शटर तक नहीं लग पाए हैं। कई दुकानों का आवंटन नहीं हुआ, जबकि जिनका आवंटन हुआ है उनमें भी कई वर्षों से ताले लटके हैं। रखरखाव के अभाव में भवन जर्जर होते जा रहे हैं और सरकारी संपत्ति बर्बादी की कगार पर पहुंच गई है।
सबसे गंभीर मामला सागरपारा का सामने आया है। यहां योजना के तहत निर्मित पांच दुकानों पर कांग्रेस से जुड़े एक जनप्रतिनिधि के कब्जे के आरोप हैं। दुकानों में व्यवसाय के बजाय साउंड सिस्टम का सामान रखा गया है। स्थानीय लोगों का दावा है कि इसकी शिकायत नगर निगम तक पहुंची, लेकिन कार्रवाई आज तक नहीं हुई। वहीं शहर में यह चर्चा भी है कि कुछ अन्य स्वावलंबन दुकानों पर भाजपा से जुड़े पदाधिकारियों का भी कब्जा है। मामला केवल कब्जे तक सीमित नहीं है। नगर निगम की दुकानों का किराया भी नियमित रूप से नहीं वसूला जा रहा है। कई दुकानदार चार से पांच वर्षों से किराया जमा नहीं कर रहे, फिर भी उनके खिलाफ न सीलबंदी की कार्रवाई हुई और न ही वसूली के लिए कोई प्रभावी कदम उठाया गया। इससे निगम को आर्थिक नुकसान उठाना पड़ रहा है।
धूल फांक रहे आवेदन
इधर, स्वावलंबन योजना की दुकानों के लिए बड़ी संख्या में आवेदन वर्षों से निगम कार्यालय में लंबित पड़े हैं। पात्र शिक्षित बेरोजगारों का कहना है कि वे रोजगार के लिए दुकान मांग रहे हैं, लेकिन उनकी फाइलें कार्यालय में धूल फांक रही हैं। संबंधित विभाग के अधिकारी भी स्पष्ट जवाब देने से बचते हैं, जिससे पारदर्शिता पर सवाल उठ रहे हैं। अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब सरकारी योजना का उद्देश्य बेरोजगारों को आत्मनिर्भर बनाना था, तो आखिर दुकानें नेताओं और प्रभावशाली लोगों के कब्जे में कैसे पहुंच गईं? यदि कब्जों और बंद दुकानों की निष्पक्ष जांच कर कार्रवाई की जाए, तो न केवल करोड़ों रुपये की सरकारी संपत्ति बचाई जा सकती है, बल्कि दर्जनों बेरोजगार युवाओं को रोजगार का अवसर भी मिल सकता है।