July 28, 2026


खेतों की उर्वरा शक्ति हो रही कमजोर मिट्टी में पोषक तत्वों का संकट



राजनांदगांव: लगातार बढ़ते रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों के अंधाधुंध उपयोग तथा फसल अवशेष (पलारी) जलाने की प्रवृत्ति अब खेती की जमीन की सेहत पर भारी पड़ने लगी है। इसका असर चार जिलोंराजनांदगांव, बालोद, मोहला-मानपुर-चौकी और खैरागढ़-छुईखदान-गंडई—की मिट्टी में साफ दिखाई दे रहा है। वर्ष 2025-26 में मृदा परीक्षण केंद्र द्वारा 6,200 से अधिक मिट्टी के नमूनों की जांच में करीब 70 प्रतिशत नमूनों में नाइट्रोजन, फास्फोरस और जिंक की कमी पाई गई। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि समय रहते मिट्टी की उर्वरता सुधारने के उपाय नहीं किए गए तो आने वाले वर्षों में फसलों की उत्पादकता और गुणवत्ता दोनों प्रभावित होंगी।

कृषि विशेषज्ञों के अनुसार किसान फसल कटाई के बाद खेतों में बचे अवशेषों में आग लगा देते हैं, जिससे मिट्टी में मौजूद जैविक पदार्थ और लाभकारी सूक्ष्मजीव नष्ट हो जाते हैं। दूसरी ओर रासायनिक कीटनाशकों और उर्वरकों के अत्यधिक उपयोग ने भी मिट्टी का प्राकृतिक संतुलन बिगाड़ दिया है। यही वजह है कि हर वर्ष मृदा परीक्षण में पोषक तत्वों की कमी बढ़ती जा रही है।

 16 पोषक तत्वों की होती है जरूर

मिट्टी की अच्छी सेहत के लिए कुल 16 आवश्यक पोषक तत्वों की जरूरत होती है। इनमें कार्बन, हाइड्रोजन और आक्सीजन वातावरण व पानी से मिलते हैं, जबकि नाइट्रोजन, फास्फोरस, पोटाश, सल्फर, कैल्शियम, मैग्नीशियम, जिंक, आयरन, बोरान, कॉपर, मैंगनीज और क्लोरीन जैसे तत्व अन्य स्रोतों से उपलब्ध कराए जाते हैं। लेकिन वर्तमान में इन पोषक तत्वों का संतुलन लगातार बिगड़ रहा है। आंकड़े बताते हैं कि वर्ष 1970-75 में प्रति हेक्टेयर मात्र 12.4 किलोग्राम उर्वरक का उपयोग होता था, जो अब बढ़कर 120 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर तक पहुंच गया है। इसके साथ ही कीटनाशकों की खपत भी लगातार बढ़ रही है। जांच में यह भी सामने आया कि करीब 85 प्रतिशत मिट्टी में जैविक कार्बन (देसी खाद) की कमी है। इसके अलावा सल्फर, जिंक, आयरन और बोरान जैसे सूक्ष्म पोषक तत्व भी पर्याप्त मात्रा में नहीं मिल रहे हैं।

पोषक तत्वों की कमी का सीधा असर फसलों पर पड़ रहा है। पोटाश की कमी से जड़ों का विकास कमजोर होता है, सल्फर की कमी से सब्जियों की गुणवत्ता प्रभावित होती है, आयरन की कमी से पौधों की वृद्धि रुक जाती है, जिंक की कमी से बीज उत्पादन घटता है और धान, गेहूं व मक्का जैसी फसलों में खैरा व झुलसा रोग का खतरा बढ़ जाता है। वहीं बोरान की कमी होने पर धान और गेहूं में बालियां तो निकलती हैं, लेकिन उनमें दाने नहीं भरते।

बढ़ता रासायनिक उपयोग बना चिंता का कारण

6200 से अधिक मिट्टी के नमूनों की जांच।

70 प्रतिशत नमूनों में नाइट्रोजन, फास्फोरस और जिंक की कमी।

85 प्रतिशत मिट्टी में जैविक कार्बन की कमी।

1970-75 में 12.4 किलो प्रति हेक्टेयर उर्वरक उपयोग, अब 120 किलो तक।

पलारी जलाने और अधिक कीटनाशक उपयोग से मिट्टी की उर्वरता घट रही है।

किस पोषक तत्व की कमी से क्या नुकसान

नाइट्रोजन: पौधों की बढ़वार प्रभावित।

पोटाश: जड़ों का विकास कमजोर।

सल्फर: सब्जियों की गुणवत्ता घटती है।

जिंक: बीज उत्पादन कम, धान-गेहूं में खैरा रोग।

आयरन: पौधों की वृद्धि रुक जाती है।

बोरान: बालियां तो बनती हैं, लेकिन दाने नहीं भरते।


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