राजनांदगांव: किसी भूखे को भरपेट भोजन कराना सबसे बड़ा पुण्य है। जहां लोग अपनी जरूरतों को पूरा करने के लिए दिन-रात मेहनत करते हैं, वहीं कुछ लोग ऐसे भी हैं, जो अपनी कमाई का हिस्सा दूसरों की भूख मिटाने के लिए खर्च करते हैं। शहर में दादाजी ग्रुप वेलफेयर सोसायटी के सदस्य इसी सेवाभाव की मिसाल पेश कर रहे हैं। संस्था के 11 सदस्य हर माह अपनी बचत से तीन हजार रुपये जुटाकर रेलवे स्टेशन परिसर के आसपास रहने वाले गरीबों और जरूरतमंदों को प्रतिदिन निश्शुल्क भोजन कराते हैं। पिछले 11 वर्षों से चल रही इस सेवा के माध्यम से रोजाना 200 से अधिक लोगों की भूख मिटाने का प्रयास किया जा रहा है। संस्था का संकल्प है कि कोई भी व्यक्ति भूखे पेट सोने को मजबूर न हो।
भोजन की खुशबू से महक उठता है स्टेशन परिसर
दादाजी ग्रुप वेलफेयर सोसायटी के सदस्यों की दिनचर्या में जरूरतमंदों को भोजन कराना शामिल हो गया है। रात आठ बजते ही रेलवे स्टेशन परिसर के आसपास भोजन की खुशबू फैलने लगती है। इसे देखते ही जरूरतमंद एकत्रित होने लगते हैं। इसके बाद सभी को बारी-बारी से भोजन परोसा जाता है। भोजन में दाल, चावल, सब्जी और रोटी शामिल रहती है। संस्था केवल पेट भरने तक सीमित नहीं है, बल्कि विशेष अवसरों को भी जरूरतमंदों के साथ साझा करती है। सदस्यों के जन्मदिन, शादी की सालगिरह और नामकरण जैसे अवसरों पर गुलाब जामुन, लड्डू और जलेबी जैसे पकवान भी परोसे जाते हैं।
कोरोना काल में भी नहीं थमने दी सेवा
संस्था के लिए जरूरतमंदों तक भोजन पहुंचाने का सफर आसान नहीं था। सभी सदस्य अलग-अलग क्षेत्रों में कार्यरत हैं। इसके बावजूद उन्होंने आपसी सहयोग से हर माह राशि बचाकर भोजन सेवा जारी रखने का संकल्प लिया। धीरे-धीरे यह पहल एक नियमित सेवा अभियान में बदल गई। कोरोना संक्रमण के कठिन दौर में भी सदस्यों ने कोविड गाइडलाइन का पालन करते हुए दोपहर और रात में जरूरतमंदों को भोजन उपलब्ध कराया। विपरीत परिस्थितियों में भी सेवा का यह सिलसिला जारी रहा।
घर जैसे भोजन से तृप्त हो रहा मन
संस्था के सदस्यों का कहना है कि जरूरतमंदों को भोजन कराने से मन को संतुष्टि मिलती है और समाज के प्रति जिम्मेदारी का एहसास मजबूत होता है। वहीं, भोजन करने वाले जरूरतमंदों के लिए यह पहल बड़ी राहत है। उनका कहना है कि प्रतिदिन घर जैसा भोजन मिलने से पेट भरने के साथ मन भी तृप्त हो जाता है। महंगाई और आर्थिक तंगी के बीच दो वक्त के भोजन के लिए संघर्ष करने वालों के चेहरे पर मुस्कान लाने वाली यह पहल बताती है कि समाज में बदलाव लाने के लिए बड़े संसाधनों से ज्यादा मजबूत इच्छाशक्ति और सेवाभाव की जरूरत होती है।