राजनांदगांव: शासकीय दिग्विजय स्वशासी स्नातकोत्तर महाविद्यालय के वनस्पति विज्ञान विभाग के सहायक प्राध्यापक डा. केशवराम आडिल द्वारा विकसित केराटिन आधारित कंडक्टिव नैनोफाइबर अब घावों के इलाज में नई दिशा देने की तैयारी में है। डा आडिल के नेतृत्व में छह वर्षों तक चले शोध के बाद यह तकनीक तैयार हुई है, जो तेजी से घाव भरने (फास्ट वाउंड हीलिंग) में सहायक मानी जा रही है।
इस तकनीक की खास बात यह है कि इसमें मुर्गी के पंख, भेड़ के ऊन और मानव बाल जैसे अपशिष्ट से प्राप्त केराटिन प्रोटीन का उपयोग किया गया है। इलेक्ट्रो स्पिनिंग तकनीक से तैयार यह नैनोफाइबर विद्युत चालक होता है, जो घाव पर हल्की विद्युत उत्तेजना (इलेक्ट्रिकलस्टिमुलेशन) देकर कोशिकाओं की वृद्धि, प्रसार और ऊतक पुनर्निर्माण की प्रक्रिया को तेज करता है।
यह सामग्री शरीर के अनुकूल, गैर-विषैली और प्राकृतिक ऊतक संरचना (एक्स्ट्रा सेलुलर मैट्रिक्स) जैसी होती है। इससे संक्रमण कम होता है और घाव तेजी से भरते हैं। खासकर पुराने घाव, जलने और मधुमेह से जुड़े घावों में इसके उपयोग की संभावना बताई गई है।
अब इस शोध का अगला चरण एनिमल टेस्ट और सेल कल्चर पर प्रयोग करना है, जिससे इसकी प्रभावशीलता को और वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित किया जा सके। साथ ही इसे व्यावसायिक स्तर पर विकसित करने की दिशा में भी प्रयास किए जा रहे हैं।
जांच में हुई गुणों की पुष्टि
यह नैनोफाइबर दिग्विजय कालेज के वनस्पति विज्ञान विभाग की प्रयोगशाला में ही विकसित किया गया है। तैयार सामग्री की जांच एनआइटी रायपुर और पंडित रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय की प्रयोगशालाओं में की जा चुकी है, जहां इसके गुणों की पुष्टि हुई है। परियोजना को नेशनल रिसर्च फाउंडेशन (एएनआरएफ) की श्योर योजना के तहत करीब 29 लाख रुपये का अनुदान मिला है। इस शोध में डा आडिल के साथ रिसर्च स्कालर नितेश कुमार मदद कर रहे हैं।
वेस्ट टू वेल्थ का सफल उदाहरण
इस शोध में अपशिष्ट पदार्थों का उपयोग कर उपयोगी मेडिकल उत्पाद तैयार किया गया है। मुर्गी के पंख, ऊन और बाल जैसे संसाधनों को सामान्यत: बेकार माना जाता है, लेकिन इन्हीं से उच्च गुणवत्ता वाला बायोमटेरियल तैयार किया गया। इससे पर्यावरण संरक्षण को बढ़ावा मिलेगा और अपशिष्ट प्रबंधन की दिशा में नया माडल विकसित होगा।
स्टार्टअप और मेडिकल सेक्टर में संभावनाएं
इस नवाचार से स्टार्टअप और उद्योग के क्षेत्र में नए अवसर बनने की संभावना है। केराटिन आधारित कंडक्टिव नैनोफाइबर से सस्ती, पर्यावरण अनुकूल और उन्नत वाउंड ड्रेसिंग, बायोमटेरियल पैच, स्मार्ट बैंडेज सहित अन्य मेडिकल उत्पाद तैयार किए जा सकते हैं। इससे अपशिष्ट पदार्थों से उपयोगी उत्पाद बनाकर स्थानीय स्तर पर रोजगार सृजन और निर्यात की संभावनाएं बढ़ेंगी। साथ ही टिकाऊ व्यवसाय माडल विकसित करने का रास्ता भी खुलेगा।
पर्यावरण संरक्षण में भी योगदान
यह शोध न केवल चिकित्सा क्षेत्र में नवाचार लाएगा, बल्कि अपशिष्ट प्रबंधन को बढ़ावा देकर पर्यावरण संरक्षण में भी योगदान देगा। इस तकनीक को व्यावसायिक स्तर पर विकसित कर स्टार्टअप इको सिस्टम से जोड़ने की दिशा में भी आगे बढ़ा जा रहा है।
डा. केशवराम आडिल, सहायक प्राध्यापक, दिग्विजय महाविद्यालय