राजनांदगांव: सड़कों पर दौड़ रहे कई वाहन खुलेआम काला धुआं उगल रहे हैं, लेकिन इन पर अंकुश लगाने वाली प्रदूषण जांच व्यवस्था ही ठप पड़ गई है। प्रदूषण जांच केंद्र बंद होने से वाहन चालकों की जांच नहीं हो पा रही है, जिसका सीधा असर पर्यावरण और लोगों के स्वास्थ्य पर पड़ रहा है। धुएं से वायु गुणवत्ता लगातार प्रभावित हो रही है, वहीं जिम्मेदार विभाग की निष्क्रियता पर भी सवाल उठने लगे हैं।16 से अधिक प्रदूषण जांच केंद्र खोले गए थे, जो अब पूरी तरह से बंद हो चुके हैं, जो चल रहे हैं वे सिर्फ सर्टिफिकेट देने तक ही सीमित हैं। यहां ईमानदारी से जांच नहीं हो रही है। डाक्टरों के मुताबिक वाहनों से निकलने वाले धुएं से जो कार्बन मोनो आक्साइड निकलता है, अगर वह 120-पीपीएम से ज्यादा है तो स्वास्थ्य के लिए बेहद हानिकारक है।
स्वास्थ्य के लिए घातक
परिवहन विभाग और ट्रैफिक पुलिस भी प्रदूषण मानकों के उल्लंघन पर प्रभावी कार्रवाई नहीं कर पा रही है। इसका फायदा उठाकर कई पुराने और खराब स्थिति वाले वाहन सड़कों पर धड़ल्ले से दौड़ रहे हैं और वातावरण में जहरीला धुआं छोड़ रहे हैं। वाहनों से निकलने वाला काला धुआं कार्बन मोनोआक्साइड, नाइट्रोजन आक्साइड और सूक्ष्म कणों (पीएम) का स्तर बढ़ाता है, जिससे सांस संबंधी बीमारियों, एलर्जी और अस्थमा के मरीजों को सबसे अधिक परेशानी होती है।
हर छह माह में जांच जरुरी
वाहनों के प्रदूषण पर लगाम न लगने से दमा, चर्मरोग और खांसी के मरीजों की संख्या में भी दिनों दिन इजाफा होता जा रहा है। ऐसा तब है जबकि मोटर व्हैकिल एक्ट की धारा 115(2) के अनुसार हर छह महीने पर प्रदूषण जांच कराना अनिवार्य है। वाहनों के प्रदूषण जांच नहीं कराने पर एक हजार रुपये जुर्माना का प्रविधान भी एक्ट में किया गया है। लेकिन जिले में प्रदूषण जांच केंद्र नहीं होने से प्रदूषण नियंत्रण की सारी कवायद बेमानी साबित हो रही है।
ये व्यवस्था होनी चाहिए
मुख्य मार्गों के किनारे दोनों ओर पौधरोपण।
आफ रोड वाहनों की जांच हो।
प्रत्येक वाहन पर प्रदूषण कंट्रोल बोर्ड की एनओसी अनिवार्य की जाए।
प्रत्येक पेट्रोल पंप पर वाहनों का प्रदूषण मापने की व्यवस्था हो।
कंडम वाहनों पर सख्ती से कार्रवाई कर उन्हें हटाया जाए।
शुद्ध डीजल-पेट्रोल उपभोक्ताओं को प्राप्त हो सके।