April 24, 2026


अभिभावकों की जेब पर बोझ जिम्मेदार मौन

राजनांदगांव:नये शिक्षा सत्र शुरू होते ही निजी स्कूलों के प्रबंधकों की मनमानी शुरू हो गई है। शहर में 20 से अधिक बड़े स्कूल हैं, जहां सीजीबीएसई, सीजी बोर्ड में पढ़ाई हो रही है। निजी स्कूलों द्वारा अभिभावकों पर निर्धारित दुकानों से ही किताबें और स्कूल ड्रेस खरीदने का दबाव बनाया जा रहा है। इस संबंध में कई पालकों ने संबंधित विभागीय अधिकारियों से शिकायत भी की है, लेकिन अब तक इस मामले में कोई ठोस कार्रवाई नहीं हो सकी है। निजी स्कूलों में पढ़ने वाले विद्यार्थियों के अभिभावकों को हर वर्ष नए सत्र की शुरुआत में पुस्तकों और यूनिफार्म की सूची दी जाती है। साथ ही यह भी स्पष्ट रूप से बताया जाता है कि ये सामग्री केवल तय दुकानों से ही खरीदी जाए। इन दुकानों पर सामान की कीमत बाजार दर से अधिक होती है, जिससे उन पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ पड़ता है।

शिकायतों की अनदेखी, अभिभावकों में नाराजगी

मामले की गंभीरता को देखते हुए शिक्षा विभाग को जांच के लिए टीम गठित करनी चाहिए थी, लेकिन अब तक न तो कोई जांच समिति बनाई गई है और न ही शिकायतों की औपचारिक जांच शुरू की गई है। इससे पालकों में नाराजगी बढ़ती जा रही है। उनका कहना है कि यदि समय रहते इस पर रोक नहीं लगाई गई, तो यह समस्या और विकराल रूप ले सकती है। पाठ्य पुस्तकों की खरीद के नाम पर कमीशन का खेल भी चल रहा है। कुछ स्कूल प्रबंधन और दुकानदारों के बीच सांठगांठ होती है, जिसके चलते अभिभावकों को मजबूरी में महंगे दामों पर खरीदना पड़ता है।

प्रकाशक का नाम और न ही एमआरपी

अभिभावकों की जेब कटनी शुरू हो गई है। कापी-किताबों में कमीशन के नाम पर बड़ा खेल खेला जा रहा है। जिसका शिकार अभिभावक हो रहे हैं। स्कूल प्रबंधनों ने दुकानें भी निर्धारित कर रखी हैं। निर्धारित दुकानों में ही किताबें मिल रही हैं। किताबों में प्रकाशक का नाम है और न ही एमआरपी। इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि कमीशन के चक्कर में निजी प्रकाशक को लाभ पहुंचाने स्कूल प्रबंधन किस हद तक जा सकते हैं। विभागीय कार्रवाई नहीं होने से स्कूल प्रबंधनों के साथ-साथ बुक डिपो संचालकों के हौसले बुलंद हैं। स्कूल प्रबंधन-और बुक डिपों संचालक अभिभावकों को हंसते-हंसते चूना लगा रहे हैं। निजी स्कूलों के प्रबंधन एनसीईआरटी की किताबों की जगह अभिभावकों पर निजी प्रकाशकों की किताबों को खरीदने का दबाव बना रहे हैं। मोटा मुनाफा कमाने के लिए स्कूल से ही कापी किताबें बेच रहे हैं। जो स्कूल किताबें नहीं बेच रहे हैं, उन्होंने अपनी दुकानें निर्धारित भी कर दी हैं। उसी दुकान पर ही उस स्कूल का पाठ्यक्रम मिलेगा। स्कूल की कापी-किताब से लेकर यूनिफार्म, टाई, बेल्ट तक मोटा कमीशन स्कूल प्रबंधन ले रहे हैं।


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