राजनांदगांव :- बच्चों के चेहरों पर मुस्कान लाने और उनकी आंखों में रोशनी बनाए रखने का संकल्प लेकर काम कर रहे गैंदाटोला के नेत्र सहायक अधिकारी मुकेश कुमार साहू एक बार फिर अपनी संवेदनशीलता और कर्तव्यनिष्ठा के चलते चर्चा में हैं। चॉकलेट वाले डॉक्टर के नाम से प्रसिद्ध मुकेश साहू ने आठवीं कक्षा की छात्रा वेदिका की दाईं आंख का सफल ऑपरेशन कराकर उसकी आंखों की रोशनी सुरक्षित रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। खास बात यह है कि जिस बच्ची के मन में अपने परिवार से भी पहले मुकेश साहू के प्रति भरोसा जागा, उसी भरोसे ने समय रहते उपचार का रास्ता खोल दिया। उनकी इस पहल ने डॉक्टर और मरीज के रिश्ते में विश्वास, अपनापन और मानवीय संवेदना की एक प्रेरक मिसाल पेश की है।
जिले में कलेक्टर जितेंद्र यादव एवं मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी डॉ. नेतराम नवरत्न के निर्देश पर शालेय नेत्र स्वास्थ्य परीक्षण अभियान संचालित किया जा रहा है। विकासखंड छुरिया में बीएमओ डॉ. उमेश भगत एवं ब्लॉक नोडल अधिकारी अंधत्व नियंत्रण विजय मेश्राम के मार्गदर्शन में चल रहे स्कूल हेल्थ प्रोग्राम के तहत प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र गैंदाटोला में पदस्थ नेत्र सहायक अधिकारी मुकेश कुमार साहू को बच्चों की आंखों की जांच एवं उपचार की जिम्मेदारी सौंपी गई है। मुकेश साहू ने अभियान के अंतर्गत 20 मिडिल स्कूलों के लगभग 2123 बच्चों की आंखों की जांच की। इस दौरान 42 बच्चों को शासन की ओर से निःशुल्क चश्मा उपलब्ध कराने की प्रक्रिया की गई, वहीं 76 बच्चों को प्राथमिक उपचार प्रदान किया गया। इस अभियान के दौरान शासकीय पूर्व माध्यमिक शाला गैंदाटोला में कक्षा आठवीं में अध्ययनरत छात्रा कु. वेदिका, पिता अरुण सेन का मामला सामने आया। वेदिका पहले से ही जन्मजात मोतियाबिंद की समस्या से पीड़ित थी। पिछले वर्ष उसकी दोनों आंखों का ऑपरेशन कराया जा चुका था। इसी बीच चोट लगने के कारण उसकी दाईं आंख में दोबारा गंभीर समस्या उत्पन्न हो गई। बच्ची ने चोट लगने की बात अपने परिवार को भी नहीं बताई, लेकिन जब वह घूमते-फिरते अस्पताल पहुंची तो सबसे पहले अपनी परेशानी मुकेश साहू को बताई। यह घटना बताती है कि बच्चों के मन में मुकेश साहू के प्रति कितना गहरा विश्वास है। अस्पताल और इलाज के नाम से घबराने वाले बच्चे उनके पास बिना किसी झिझक के अपनी परेशानी लेकर पहुंचते हैं। वेदिका का भरोसा देखकर मुकेश साहू ने भी बिना समय गंवाए बच्ची के उपचार की जिम्मेदारी उठाई। बच्ची की आंख की स्थिति को देखते हुए परिवार के लोग काफी चिंतित और परेशान थे। उन्हें आशंका थी कि कहीं उनकी बेटी की आंखों की रोशनी हमेशा के लिए न चली जाए। ऐसे कठिन समय में मुकेश साहू ने परिवार को ढांढस बंधाया और उपचार के लिए तत्काल पहल की। उन्होंने 29 अक्टूबर 2026 को वेदिका को मेडिकल कॉलेज अस्पताल राजनांदगांव में भर्ती कराया, जहां विशेषज्ञ चिकित्सकों की देखरेख में उपचार की प्रक्रिया शुरू हुई। इसके बाद 31 अक्टूबर 2026 को बच्ची की दाईं आंख का सफल ऑपरेशन किया गया। उपचार के बाद उसकी स्थिति में सुधार होने पर 2 नवंबर 2026 को अस्पताल से छुट्टी दे दी गई। समय पर उपचार और उचित चिकित्सकीय देखरेख से बच्ची को नई उम्मीद मिली। इस पूरे घटनाक्रम में मुकेश साहू की तत्परता और संवेदनशीलता ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। मुकेश कुमार साहू को पूरे प्रदेश में चॉकलेट वाले डॉक्टर के रूप में पहचान मिली है। बच्चों को चॉकलेट बांटना उनके लिए केवल एक शौक या पहचान नहीं, बल्कि स्वास्थ्य सेवाओं से जोड़ने का एक मानवीय तरीका है। वे जानते हैं कि छोटे बच्चों के मन में अस्पताल, जांच और ऑपरेशन को लेकर डर रहता है। ऐसे में चॉकलेट देकर और प्यार से बातचीत कर वे बच्चों के मन से इस डर को दूर करने का प्रयास करते हैं। उनका मानना है कि बच्चों का विश्वास जीतना भी उपचार की प्रक्रिया का महत्वपूर्ण हिस्सा है। जब बच्चा बिना डर के अपनी समस्या बताता है, तभी समय रहते उसकी परेशानी का समाधान संभव हो पाता है। वे बच्चों के साथ मित्रवत व्यवहार करते हैं, उनकी बातें ध्यान से सुनते हैं और जरूरत पड़ने पर उपचार के लिए हरसंभव पहल करते हैं। मुकेश साहू की पहल से अब तक जन्मजात मोतियाबिंद से पीड़ित बच्चों की पांच आंखों का सफल ऑपरेशन कराया जा चुका है। वनांचल और ग्रामीण क्षेत्रों में बच्चों की आंखों की समस्याओं को पहचानने, उन्हें उपचार के लिए प्रेरित करने और जरूरत पड़ने पर उच्च चिकित्सा संस्थानों तक पहुंचाने का उनका प्रयास सराहनीय है। वेदिका का मामला एक बार फिर यह संदेश देता है कि स्वास्थ्य सेवाओं में केवल संसाधन और सुविधाएं ही महत्वपूर्ण नहीं हैं, बल्कि मरीज के प्रति संवेदनशीलता, समय पर निर्णय और विश्वास भी उतने ही जरूरी हैं। मुकेश साहू अपनी इसी कार्यशैली से स्कूली बच्चों के बीच अलग पहचान बना रहे हैं। उनकी पहल से न केवल बच्चों को बेहतर नेत्र स्वास्थ्य की सुविधा मिल रही है, बल्कि ग्रामीण क्षेत्रों में स्वास्थ्य सेवाओं के प्रति जागरूकता और भरोसा भी बढ़ रहा है।