राजनांदगांव: बढ़ती खेती लागत, रासायनिक उर्वरकों पर बढ़ती निर्भरता और मिट्टी की घटती उर्वरता के बीच कृषि विभाग किसानों को एक ऐसा प्राकृतिक विकल्प अपनाने के लिए प्रेरित कर रहा है, जो न केवल खेती की लागत कम करेगा बल्कि भूमि की उत्पादकता को भी लंबे समय तक बनाए रखेगा। कृषि विभाग ने किसानों से हरी खाद के रूप में ढैंचा (सेसबेनिया) के उपयोग की अपील की है। विशेषज्ञों का मानना है कि धैचा अपनाकर किसान प्रति हेक्टेयर दो से तीन बोरी यूरिया की बचत करने के साथ-साथ मिट्टी की उर्वरता में भी उल्लेखनीय वृद्धि कर सकते हैं। ढैंचा एक दलहनी हरी खाद फसल है, जिसमें वायुमंडल से नाइट्रोजन ग्रहण कर उसे भूमि में स्थिर करने की अद्भुत क्षमता होती है। यही कारण है कि इसे प्राकृतिक नाइट्रोजन बैंक भी कहा जाता है। धैचा के उपयोग से खेतों में जैविक कार्बन बढ़ता है, मिट्टी की संरचना सुधरती है और फसलों को आवश्यक पोषक तत्व स्वाभाविक रूप से उपलब्ध होते हैं।
राजनंदगांव के फसल चक्र के लिए विशेष रूप से उपयोगी
उप संचालक कृषि टीकम सिंह ठाकुर ने बताया कि राजनांदगांव जिले में प्रचलित धान-गेहूं, धान-चना, धान-सब्जी तथा सोयाबीन आधारित फसल चक्रों में ढैंचा को शामिल करना अत्यंत लाभकारी साबित हो सकता है। हरी खाद के रूप में धैचा का उपयोग करने से प्रति हेक्टेयर लगभग 40 से 60 किलोग्राम नाइट्रोजन मिट्टी को प्राप्त होती है। इतनी मात्रा में नाइट्रोजन प्राप्त करने के लिए किसानों को सामान्यतः 90 से 130 किलोग्राम यूरिया का उपयोग करना पड़ता है। इस प्रकार धैचा सीधे तौर पर दो से तीन बोरी यूरिया की बचत कर सकता है। कृषि वैज्ञानिकों के अनुसार मानसून की शुरुआत होते ही धैचा की बुवाई करना सबसे उपयुक्त समय माना जाता है। इसके लिए प्रति हेक्टेयर 25 से 30 किलोग्राम बीज पर्याप्त होता है। बुवाई के लगभग 35 से 40 दिन बाद, जब पौधे 1 से 1.5 मीटर की ऊंचाई प्राप्त कर लें और फूल आने की प्रारंभिक अवस्था में हों, तब उन्हें खेत में ही दबाकर मिट्टी में मिला देना चाहिए। इसके लिए ट्रैक्टर चालित डिस्क हैरो, रोटावेटर अथवा मिट्टी पलटने वाले हल का उपयोग किया जा सकता है। मिट्टी में दबाने के बाद खेत में पर्याप्त नमी बनाए रखने पर लगभग 15 से 20 दिनों में धैचा पूरी तरह सड़-गलकर मिट्टी का हिस्सा बन जाता है। इसके बाद मुख्य फसल की बुवाई या रोपाई की जा सकती है।
मिट्टी की सेहत सुधारने में कारगर
ढैंचा के विघटन से मिट्टी में जैविक कार्बन, नाइट्रोजन और अन्य सूक्ष्म पोषक तत्वों की मात्रा बढ़ जाती है। इससे मिट्टी की जलधारण क्षमता मजबूत होती है, भूमि भुरभुरी बनती है और लाभकारी सूक्ष्मजीवों की सक्रियता बढ़ती है। परिणामस्वरूप आगामी फसलों की वृद्धि बेहतर होती है और उत्पादन क्षमता में वृद्धि देखने को मिलती है। रासायनिक यूरिया जहां केवल नाइट्रोजन उपलब्ध कराता है, वहीं धैचा मिट्टी की समग्र गुणवत्ता को सुधारने का कार्य करता है। कृषि विभाग द्वारा ढैंचा बीज पर 50 प्रतिशत तक अनुदान प्रदान किया जा रहा है। इच्छुक किसान बीज प्रक्रिया केंद्र, बीज निगम कार्यालय कौरिनभाठा राजनांदगांव से धैचा बीज प्राप्त कर सकते हैं।
मिट्टी की सेहत सुधरेगी
किसान संतुलित पोषण प्रबंधन अपनाते हुए ढैंचा जैसी हरी खादों का अधिकाधिक उपयोग करें। इससे खेती की लागत कम होगी, रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता घटेगी और कृषि को टिकाऊ एवं लाभकारी बनाने में मदद मिलेगी। यदि जिले के किसान बड़े पैमाने पर ढैंचा को अपनाते हैं, तो यह न केवल मिट्टी की सेहत सुधारने में मील का पत्थर साबित होगा, बल्कि भविष्य की खेती को भी अधिक लाभदायक और पर्यावरण के अनुकूल बना सकेगा।
टीकम सिंह ठाकुर, उप संचालक कृषि