September 06, 2026


झीरम फैसले के बाद डॉ. शिवकुमार डहरिया ने NIA जांच पर उठाए सवाल

13 साल बाद 10 आरोपी दोषी, लेकिन क्या पूरी साजिश का हुआ पर्दाफाश?

आरंग। छत्तीसगढ़ के बहुचर्चित झीरम घाटी हत्याकांड में NIA की विशेष अदालत के फैसले के बाद प्रदेश की सियासत एक बार फिर गरमा गई है। 13 साल पुराने इस मामले में अदालत द्वारा बचे हुए 10 आरोपियों को दोषी करार दिए जाने के बाद जहां इसे न्याय की दिशा में महत्वपूर्ण पड़ाव माना जा रहा है, वहीं पूर्व कैबिनेट मंत्री डॉ. शिवकुमार डहरिया ने राष्ट्रीय जांच एजेंसी (NIA) की जांच की दिशा और मामले की पूरी सच्चाई सामने आने को लेकर गंभीर सवाल उठाए हैं।

डॉ. डहरिया ने सवाल उठाया है कि क्या झीरम घाटी हमले में केवल हमले में शामिल आरोपियों को दोषी ठहराया जाना ही पूरी सच्चाई सामने आने के बराबर है, या इस राजनीतिक नरसंहार के पीछे छिपी पूरी साजिश का पर्दाफाश होना अभी बाकी है? उन्होंने जांच की दिशा पर सवाल उठाते हुए यह मुद्दा सामने रखा कि इतने बड़े राजनीतिक नरसंहार के पीछे केवल हमलावरों की भूमिका की जांच हुई या इसके पीछे किसी बड़े षड्यंत्र, सूचना तंत्र और संभावित मददगारों की भूमिका की भी गहराई से पड़ताल की गई।

25 मई 2013 को हुआ था दिल दहला देने वाला हमला

गौरतलब है कि 25 मई 2013 को सुकमा के झीरम घाटी क्षेत्र में कांग्रेस की परिवर्तन यात्रा के काफिले पर नक्सलियों ने घात लगाकर हमला किया था। इस हमले में तत्कालीन प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष नंदकुमार पटेल, वरिष्ठ आदिवासी नेता महेंद्र कर्मा, पूर्व केंद्रीय मंत्री विद्याचरण शुक्ल सहित कांग्रेस के कई नेता, कार्यकर्ता और सुरक्षाकर्मी मारे गए थे। इस घटना ने पूरे देश को झकझोर दिया था और इसे छत्तीसगढ़ के इतिहास के सबसे बड़े राजनीतिक नरसंहारों में गिना जाता है।

घटना के बाद मामले की जांच राष्ट्रीय जांच एजेंसी (NIA) ने अपने हाथ में ली। लंबे समय तक चली जांच और न्यायिक प्रक्रिया के बाद अब अदालत ने 10 आरोपियों को दोषी करार दिया है।

'हमले के पीछे की पूरी कड़ी सामने आना जरूरी'

अदालत के फैसले के बाद डॉ. डहरिया के सवालों ने झीरम मामले की जांच को लेकर वर्षों से चली आ रही राजनीतिक बहस को एक बार फिर चर्चा में ला दिया है। उनका सवाल है कि क्या जांच केवल हमले में प्रत्यक्ष रूप से शामिल लोगों तक सीमित रही, अथवा हमले की योजना, सूचना के आदान-प्रदान और इसके पीछे संभावित व्यापक साजिश की प्रत्येक कड़ी तक भी जांच पहुंची।

झीरम घाटी कांड को लेकर छत्तीसगढ़ में लंबे समय से यह सवाल राजनीतिक बहस का हिस्सा रहा है कि घटना को केवल नक्सली हमला मानकर जांच पूरी मानी जाए या इसके पीछे संभावित व्यापक साजिश की हर कड़ी को भी जांच के दायरे में लाया जाए।

न्यायिक फैसला महत्वपूर्ण, लेकिन सवाल अब भी बरकरार

13 साल बाद आया अदालत का फैसला निश्चित रूप से झीरम मामले की न्यायिक प्रक्रिया में एक महत्वपूर्ण पड़ाव है। दोषियों की जिम्मेदारी तय होने से पीड़ित परिवारों को न्याय की उम्मीद मजबूत हुई है। लेकिन राजनीतिक तौर पर अब यह सवाल उठ रहा है कि क्या 10 आरोपियों की दोषसिद्धि झीरम घाटी की पूरी कहानी का अंत है, या घटना के पीछे की कथित साजिश को लेकर अभी भी कुछ सवालों के जवाब बाकी हैं?

झीरम घाटी का जख्म छत्तीसगढ़ की राजनीति में आज भी गहरा है। अदालत के फैसले के बाद डॉ. शिवकुमार डहरिया द्वारा उठाए गए सवालों ने एक बार फिर सरकार और जांच एजेंसी के सामने यह मुद्दा खड़ा कर दिया है कि दोषियों तक पहुंचने के बाद क्या अब झीरम घाटी की पूरी साजिश और उसके पीछे की अंतिम कड़ी का सच भी सामने आएगा?



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