खैरागढ़: शासकीय कामकाज में पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 के प्रावधानों का पालन जरूरी है। नागरिकों को निर्धारित समय-सीमा में सही जानकारी उपलब्ध कराना अधिकारियों-कर्मचारियों की जिम्मेदारी है। आवेदन के निराकरण में लापरवाही, अनावश्यक देरी या जानबूझकर गलत जानकारी देने पर संबंधित अधिकारियों के खिलाफ अर्थदंड की कार्रवाई भी हो सकती है। इन प्रावधानों से अधिकारियों-कर्मचारियों को अवगत कराने के लिए शुक्रवार को कलेक्ट्रेट सभाकक्ष में जिला स्तरीय प्रशिक्षण आयोजित किया गया।
कलेक्टर इंद्रजीत सिंह चंद्रवाल के निर्देशन में आयोजित प्रशिक्षण में उद्योग विभाग के महाप्रबंधक श्री बघेल और आदिवासी विकास विभाग के सहायक आयुक्त स्वर्णिम शुक्ला ने मास्टर ट्रेनर के रूप में मार्गदर्शन दिया। इसमें जिला स्तरीय अधिकारी-कर्मचारियों के साथ चार विकासखंड स्तरीय प्रशिक्षक भी शामिल हुए।
30 दिन में देना होगा जवाब, विशेष मामलों में 48 घंटे की समय-सीमा
प्रशिक्षण के दौरान मास्टर ट्रेनरों ने सूचना का अधिकार अधिनियम की प्रमुख धाराओं और उनके व्यावहारिक उपयोग की जानकारी दी। बताया गया कि अधिनियम की धारा 7 के तहत सामान्यतः आवेदन मिलने के 30 दिनों के भीतर सूचना देने अथवा उस पर निर्णय लेने का प्रावधान है। वहीं, किसी व्यक्ति के जीवन या स्वतंत्रता से संबंधित सूचना 48 घंटे के भीतर उपलब्ध करानी होती है। निर्धारित समय-सीमा में सूचना नहीं मिलने पर नियमानुसार जानकारी निःशुल्क उपलब्ध कराने का प्रावधान है।
दूसरे विभाग से संबंधित आवेदन पांच दिन में भेजना जरूरी
अधिकारियों को बताया गया कि नागरिकों से सूचना मांगने का कारण पूछना आवश्यक नहीं है। यदि आवेदन किसी अन्य लोक प्राधिकारी से संबंधित है, तो उसे अधिकतम पांच दिनों के भीतर संबंधित प्राधिकारी को स्थानांतरित कर आवेदक को इसकी जानकारी देनी होती है। धारा चार और पांच के प्रावधानों के तहत अभिलेखों का व्यवस्थित संधारण, विभागीय जानकारी का प्रकाशन और जनसूचना अधिकारियों की भूमिका भी समझाई गई।
जवाब से असंतुष्ट होने पर अपील का प्रावधान
प्रशिक्षण में अपील प्रक्रिया की जानकारी देते हुए बताया गया कि निर्धारित समय में जवाब नहीं मिलने या प्राप्त निर्णय से असंतुष्ट होने पर आवेदक प्रथम अपील कर सकता है। इसके बाद सूचना आयोग में द्वितीय अपील का प्रविधान है। वहीं, बिना उचित कारण सूचना देने में देरी करने अथवा जानबूझकर गलत, अधूरी या भ्रामक जानकारी देने पर धारा 20 के तहत अर्थदंड लगाया जा सकता है।