राजनांदगांव: मौत सामने खड़ी हो और उस समय भी मन में भक्ति का भाव बना रहे तो जीवन धन्य हो जाता है। ऐसी स्थिति में भी भक्ति में डूबे रहने वाले बिरले ही होते हैं। यह बात खरतरगच्छाधिपति मणिप्रभ सागर के सुशिष्य मुनि श्रेयांशप्रभ सागर ने संवत्सरी पर्व के पहले दिन जैन बगीचा स्थित नए हाल में नियमित प्रवचन के दौरान कही।
मुनि श्रेयांशप्रभ सागर ने कहा कि मन में सदैव जीवदया का भाव रखना चाहिए। एक अभयदान भी परिस्थितियों को बदल सकता है। उन्होंने कहा कि भाव कितने भी अच्छे हों, लेकिन मौत सामने आने पर बड़े से बड़े व्यक्ति के विचार बदल जाते हैं। ऐसे समय में भी भक्ति का भाव बना रहे तो जीवन की दिशा बदल सकती है।
उन्होंने कहा कि जिज्ञासा केवल मनुष्यों में ही नहीं, पशुओं में भी होती है। जिज्ञासाओं का समाधान एकांत में आत्मचिंतन से किया जा सकता है। यदि विचारों की दिशा समय रहते नहीं बदली तो बाद में पश्चाताप करना पड़ता है। इसलिए विचारों पर नियंत्रण रखना और उन्हें सकारात्मक दिशा देना सीखना चाहिए।
मुनि ने कहा कि संवत्सरी पर्व आराधना और आत्मचिंतन का पर्व है। इस दौरान जितनी अधिक आराधना की जाती है, उतना ही आत्मिक लाभ मिलता है और व्यक्ति अपने लक्ष्य की ओर आगे बढ़ता है। मीडिया प्रभारी विमल हाजरा ने यह जानकारी दी।