राजनांदगांव : बसंतपुर स्थित जिला अस्पताल में मोतियाबिंद के मरीजों के लिए उपचार की राह मुश्किल हो गई है। नेत्र विशेषज्ञ चिकित्सकों, आपरेशन थियेटर (ओटी) और जरूरी उपकरणों की उपलब्धता के बावजूद अप्रैल 2026 से सर्जरी लगभग ठप पड़ी है। अप्रैल में महज पांच आपरेशन होने की जानकारी है, जबकि पहले हर महीने औसतन 40 से 50 मरीजों की सर्जरी होती थी। छह महीने से बनी इस स्थिति का सीधा असर मरीजों पर पड़ रहा है। सरकारी अस्पताल में कम खर्च पर उपचार की उम्मीद लेकर पहुंचने वाले मरीजों को निजी अस्पतालों में 20 से 30 हजार रुपये तक खर्च करने पड़ रहे हैं।
जानकारी के अनुसार सर्जरी बंद रहने के दौरान अलग-अलग कारण बताए जाते रहे। कभी ओटी में बारिश का पानी घुसने और संक्रमण की आशंका का हवाला दिया गया, तो कभी उपकरणों में खराबी और ओटी की कल्चर रिपोर्ट नहीं आने की बात सामने आई। अब चिकित्सकों के अन्य प्रशासनिक कार्यों में व्यस्त रहने का तर्क दिया जा रहा है। इन कारणों के बीच सर्जरी नियमित रूप से शुरू नहीं हो सकी।
तकनीशियन लौटे, फिर भी शुरू नहीं हुए आपरेशन
जानकारी के अनुसार, दो प्रशिक्षित तकनीशियनों का संलग्नीकरण समाप्त होने के बाद नेत्र चिकित्सक उन्हें दोबारा जिला अस्पताल में पदस्थ करने की मांग कर रहे थे। हालांकि, संलग्नीकरण समाप्त होने के बाद भी अस्पताल में चार अन्य तकनीशियन उपलब्ध थे। मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी की ओर से तकनीशियनों को दोबारा संलग्न किए जाने के बाद भी आपरेशन शुरू नहीं हुए। इससे स्पष्ट है कि सर्जरी शुरू करने में आ रही बाधाओं का निराकरण अब तक नहीं हो पाया है। सूत्रों के अनुसार, सिविल सर्जन ने नेत्र विभाग के विभागाध्यक्ष और अन्य चिकित्सकों को अक्टूबर के अंत तक आपरेशन शुरू करने का समय दिया है। निर्धारित अवधि में सर्जरी शुरू होती है या नहीं, यह देखना महत्वपूर्ण होगा।
निजी अस्पतालों में सेवा दे रहे, यहां लूट रहे मरीज
जानकारी के अनुसार जिला अस्पताल में सेवारत नेत्र चिकित्सक निजी अस्पतालों में सेवाएं दे रहे हैं। जबकि नेशनल हेल्थ मिशन के तहत संविदा में नियुक्ति वाले इन चिकित्सकों को क्लिनिक चलाने तक की अनुमति नहीं है। नर्सिंग होम और नियम-शर्तों की जांच करने वाले अधिकारी भी इन पर रहम कर रहे हैं। दूसरी ओर जिला अस्पताल में सर्जरी नहीं होने से मरीजों को निजी अस्पतालों की शरण लेनी पड़ रही है। वहां मोतियाबिंद के आपरेशन पर 20 से 30 हजार रुपये तक खर्च हो रहे हैं। आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों के लिए यह राशि जुटाना आसान नहीं है। सरकारी अस्पताल में उपलब्ध सुविधाओं का उपयोग नहीं हो पाने से मरीजों पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ पड़ रहा है।
दिव्यांग प्रमाण पत्र के लिए भी परेशानी
नेत्र विभाग की कार्यप्रणाली को लेकर शिकायतें सर्जरी तक सीमित नहीं हैं। दिव्यांगता प्रमाण पत्र बनवाने के लिए निर्धारित दिन पहुंचने वाले लोगों को भी परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है। पूर्व में शिकायत मिलने पर जिला प्रशासन ने संबंधित महिला चिकित्सक को तलब कर फटकार लगाई थी। इसके बाद भी व्यवस्था में सुधार नहीं होने की शिकायतें सामने आ रही हैं। मितानिनों की ओर से भी विभाग की कार्यप्रणाली और कथित दुर्व्यवहार से परेशान होकर मरीजों को यहां भेजने में रुचि नहीं लेने की शिकायत है।