July 03, 2026


खामोशी से मुस्कान तक: चिरायु योजना ने दो मासूमों को सुनने और बोलने की नई दुनिया दी आरबी

आरबीएसके की समय पर पहचान और एम्स रायपुर में सफल कॉक्लियर इम्प्लांट से बदली गर्वी और गनिका की जिंदगी

आरंग। कुछ समय पहले तक ग्राम चपरीद की नन्हीं गर्वी साहू और ग्राम नकटा की तीन वर्षीय गनिका सोनी अपने आसपास की आवाज़ों से अनजान थीं। परिवार के लोग पुकारते, बातें करते, लेकिन दोनों बच्चियां कोई प्रतिक्रिया नहीं देती थीं। जन्मजात बहरेपन के कारण उनके माता-पिता अपने बच्चों के भविष्य को लेकर चिंतित थे।

इसी दौरान राष्ट्रीय बाल स्वास्थ्य कार्यक्रम (आरबीएसके) की टीम ने स्वास्थ्य परीक्षण के दौरान दोनों बच्चियों की जांच की। विशेषज्ञों ने समय रहते जन्मजात बहरेपन की पहचान की और उन्हें चिरायु योजना के तहत एम्स रायपुर रेफर किया गया।

एम्स रायपुर में विशेषज्ञ चिकित्सकों द्वारा विस्तृत जांच एवं आवश्यक परीक्षण के बाद दोनों बच्चियों की कॉक्लियर इम्प्लांट सर्जरी सफलतापूर्वक की गई। इसके बाद नियमित मैपिंग, स्पीच थेरेपी और श्रवण प्रशिक्षण शुरू किया गया।

आज स्थिति पूरी तरह बदल चुकी है। गर्वी और गनिका अब ध्वनियों पर सकारात्मक प्रतिक्रिया दे रही हैं। वे धीरे-धीरे आवाज़ों को पहचानना सीख रही हैं और बोलने की दिशा में भी निरंतर प्रगति कर रही हैं। बच्चों की इस प्रगति ने उनके परिवारों के चेहरों पर नई मुस्कान ला दी है। जिन घरों में कभी बच्चों के भविष्य की चिंता थी, वहां अब उम्मीद और खुशी का माहौल है।

यह सफलता इस बात का प्रमाण है कि यदि जन्मजात समस्याओं की समय पर पहचान हो जाए और उचित उपचार उपलब्ध कराया जाए, तो बच्चों का भविष्य संवारा जा सकता है। आरबीएसके और चिरायु योजना ने न केवल दोनों बच्चियों को सुनने और बोलने का अवसर दिया, बल्कि उनके परिवारों को भी नई आशा प्रदान की।

इस उपलब्धि में बीएमओ डॉ. विजय लक्ष्मी अनंत के मार्गदर्शन और सहयोग की महत्वपूर्ण भूमिका रही। वहीं चिरायु टीम के डॉ. भूपेश गेंद्रे, डॉ. शिल्पा कटारिया, फार्मासिस्ट विनीत कुमार एवं परनिता वर्मा ने दोनों बच्चों की पहचान, परामर्श, रेफरल, आवश्यक समन्वय तथा नियमित फॉलो-अप में सक्रिय योगदान दिया। टीम के समर्पित प्रयासों के परिणामस्वरूप दोनों बच्चियों का सफल उपचार संभव हो सका।

गर्वी और गनिका की यह कहानी केवल दो बच्चों के इलाज की नहीं, बल्कि समय पर स्वास्थ्य जांच, सरकारी योजनाओं की प्रभावी पहुंच और स्वास्थ्यकर्मियों की संवेदनशीलता की मिसाल है। यह संदेश भी देती है कि सही समय पर की गई पहल किसी बच्चे के पूरे जीवन की दिशा बदल सकती है।


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