June 24, 2026


कारागार में गूंजी राग की स्वर लहर : संगीत चिकित्सा सत्र ने कैदियों को कराया आत्मिक शांति का अनुभव

राजनांदगांव: भारतीय संगीत परंपरा में संगीत को आत्मशुद्धि, मानसिक संतुलन और आंतरिक चेतना के जागरण का सशक्त माध्यम माना गया है। इसी विचार को मूर्त रूप देते हुए राजकुमारी इंदिरा सिंह कला संगीत विश्वविद्यालय खैरागढ़ की कुलपति डा.लवली शर्मा ने शुक्रवार को खैरागढ़ उपजेल में बंद कैदियों के लिए एक विशेष संगीत-चिकित्सा सत्र का आयोजन किया। इस अवसर पर भारतीय शास्त्रीय संगीत की प्रस्तुति ने जेल परिसर को आध्यात्मिक और चिंतनशील वातावरण में परिवर्तित कर दिया। कार्यक्रम के दौरान डा.लवली शर्मा ने अपने भावपूर्ण सितार वादन से ऐसा संगीतमय माहौल निर्मित किया जिसने उपस्थित कैदियों को गहरे स्तर पर प्रभावित किया। संगीत की मधुर स्वरलहरियों के बीच कैदी पूरे मनोयोग से प्रस्तुति का आनंद लेते रहे। उनके चेहरों पर शांति, प्रसन्नता और भावनात्मक संतुलन के भाव स्पष्ट रूप से दिखाई दिए। कुछ समय के लिए वे अपनी परिस्थितियों से ऊपर उठकर सकारात्मकता और आत्मिक आनंद की अनुभूति से जुड़ते नजर आए। इस अवसर पर शीर्ष श्रेणी के तबला वादक अवध सिंह ने तबले पर संगत किया। उनके संवेदनशील, सशक्त और लयबद्ध वादन ने सितार प्रस्तुति को और अधिक प्रभावशाली बना दिया। सितार और तबले की उत्कृष्ट जुगलबंदी ने कार्यक्रम को कलात्मक ऊंचाइयों तक पहुंचाते हुए श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर दिया।

 दीर्घ कालिक अनुभव किया साझा

कार्यक्रम के दौरान डा.लवली शर्मा ने संगीत-चिकित्सा के क्षेत्र में अपने दीर्घकालिक शोध अनुभवों को भी साझा किया। उन्होंने बताया कि वर्ष 2003 में उन्होंने कारागार में बंद कैदियों पर संगीत के प्रभाव का विस्तृत अध्ययन किया था। इस शोध का उद्देश्य यह समझना था कि संगीत किस प्रकार कैदियों की मानसिक स्थिति, भावनात्मक प्रतिक्रियाओं, तनाव, व्यवहार तथा सकारात्मक सोच को प्रभावित करता है। उन्होंने कहा कि शोध के निष्कर्षों से यह स्पष्ट हुआ कि संगीत व्यक्ति के भीतर संचित तनाव और नकारात्मक भावनाओं को कम करने, आत्मचिंतन को प्रोत्साहित करने तथा मानसिक शांति और भावनात्मक संतुलन स्थापित करने में अत्यंत प्रभावी भूमिका निभाता है। उनके अनुसार संगीत-चिकित्सा केवल एक कलात्मक गतिविधि नहीं बल्कि मानव मन के पुनर्संयोजन और व्यक्तित्व के सकारात्मक पुनर्निर्माण की एक सशक्त प्रक्रिया है। प्रो.शर्मा ने कहा कि विशेष रूप से कारागार जैसे संवेदनशील परिवेश में संगीत व्यक्तियों के भीतर संवेदनशीलता, आत्मबोध और सकारात्मक परिवर्तन की संभावनाओं को जागृत करने का प्रभावी माध्यम बन सकता है। उन्होंने जोर देकर कहा कि कला और संगीत में ऐसी परिवर्तनकारी शक्ति निहित है, जो व्यक्ति के अंतर्मन को स्पर्श कर उसके दृष्टिकोण, भावनात्मक स्थिति और जीवन के प्रति सोच में सकारात्मक बदलाव ला सकती है। यह आयोजन केवल एक सांस्कृतिक प्रस्तुति तक सीमित नहीं रहा, बल्कि मानसिक स्वास्थ्य संवर्धन, मानवीय संवेदनाओं के विकास और सुधारात्मक पुनर्वास की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल के रूप में सामने आया।

 सार्वभौमिक एवं सशक्त भाषा

कारागार सुधार और मानसिक स्वास्थ्य के क्षेत्र में कुलपति डा.शर्मा के ऐसे प्रयास भविष्य में संगीत-चिकित्सा को पुनर्वास एवं सामाजिक पुनर्संरचना के प्रभावी माध्यम के रूप में स्थापित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। यह पहल एक बार फिर सिद्ध करती है कि संगीत केवल मनोरंजन का साधन नहीं बल्कि मानव मन के उपचार, संवेदनात्मक पुनर्जागरण और सकारात्मक सामाजिक परिवर्तन की सार्वभौमिक एवं सशक्त भाषा है।


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