October 31, 2026


करके सीखना : गतिविधि आधारित नवाचार से सरल हुई त्रिभुज की रचना : गणित शिक्षण विशेष अनुभाग

गणित की कक्षा में त्रिभुज की रचना कई विद्यार्थियों को आरंभ में कठिन लगती है। पटरी, परकार और चाँदे से खींची जाने वाली रेखाएँ उन्हें केवल कुछ निश्चित चरणों का क्रम दिखाई देती हैं। जब यही विषय हाथों से वस्तुएँ जोड़ने, मापने, अनुमान लगाने और अपनी गलती सुधारने का अवसर देता है, तब रचना का अर्थ बदल जाता है। विद्यार्थी समझने लगते हैं कि त्रिभुज केवल कागज पर बनी आकृति नहीं, बल्कि भुजाओं और कोणों के बीच संबंधों से बनने वाली संरचना है। इसी विचार पर आधारित गतिविधि का केंद्र है- पहले स्वयं करके देखना, फिर कारण समझना और अंत में ज्यामितीय रचना करना।

परंपरागत अभ्यास में बच्चे कभी-कभी शिक्षक के बनाए चित्र की नकल कर लेते हैं, लेकिन यह नहीं बता पाते कि परकार का चाप क्यों लगाया गया या दो चापों का प्रतिच्छेदन क्या सुनिश्चित करता है। इसलिए पाठ की शुरुआत उत्तर लिखवाने से नहीं, एक छोटे प्रश्न से हो सकती है- क्या किसी भी तीन लंबाइयों से त्रिभुज बनाया जा सकता है? इस प्रश्न से कक्षा में जिज्ञासा जगती है। जब उत्तर खोजने के लिए सामग्री हाथ में दी जाती है, तो सीखना सुनने से आगे बढ़कर खोजने की प्रक्रिया बन जाता है। रचना के नियम इस खोज के बाद सामने आते हैं।

इस नवाचार के लिए महँगे उपकरण आवश्यक नहीं हैं। रंगीन कागज की पट्टियाँ, आइसक्रीम की लकड़ियाँ, सुरक्षित किनारों वाली स्ट्रॉ, धागा, स्केल, परकार, चाँदा और चार्ट पेपर पर्याप्त हैं। तीन-तीन विद्यार्थियों के छोटे समूह बनाए जा सकते हैं। एक विद्यार्थी माप ले, दूसरा आकृति बनाए और तीसरा उसके बनने का कारण बताए; फिर भूमिकाएँ बदल दी जाएँ। ऐसी व्यवस्था में केवल तेज गति से चित्र बनाने वाला बच्चा ही सक्रिय नहीं रहता, बल्कि मापने, प्रश्न पूछने और तर्क करने वाले विद्यार्थी भी योगदान देते हैं। शिक्षक का काम तत्काल उत्तर देना नहीं, सोचने की दिशा दिखाना होता है।

पहली गतिविधि में प्रत्येक समूह को अलग-अलग लंबाइयों की तीन पट्टियाँ मिलती हैं। 4, 5 और 6 सेंटीमीटर की पट्टियों से बंद त्रिभुज बन जाता है, लेकिन 3, 4 और 8 सेंटीमीटर की पट्टियाँ सिरों को जोड़ने पर बंद आकृति नहीं बनातीं। यदि लंबाइयाँ 3, 4 और 7 सेंटीमीटर हों, तो वे एक सीधी रेखा के रूप में आ सकती हैं, त्रिभुज नहीं बनता। बच्चे तुलना करके पहचानते हैं कि किसी भी दो भुजाओं का योग तीसरी भुजा से अधिक होना चाहिए। इस प्रकार त्रिभुज असमता का नियम याद करने से पहले उसका अर्थ अनुभव में आता है।

इसके बाद कागज पर भुजा-भुजा-भुजा के आधार पर रचना कराई जा सकती है। मान लें कि 5, 6 और 7 सेंटीमीटर की भुजाओं वाला त्रिभुज बनाना है। पहले स्केल से AB = 7 सेंटीमीटर का रेखाखंड खींचा जाता है। फिर परकार को 5 सेंटीमीटर खोलकर A केंद्र से एक चाप और 6 सेंटीमीटर खोलकर B केंद्र से दूसरा चाप लगाया जाता है। जहाँ दोनों चाप मिलते हैं, उस बिंदु को C मानकर AC और BC जोड़ देते हैं। अब ABC वांछित त्रिभुज है। इस प्रक्रिया में हर चरण का स्पष्ट गणितीय कारण मौजूद है।

विद्यार्थियों से पूछा जा सकता है कि C को चापों के प्रतिच्छेदन पर ही क्यों चुना गया। जब वे समझते हैं कि A केंद्र वाले चाप का हर बिंदु A से 5 सेंटीमीटर दूर है और B केंद्र वाले चाप का हर बिंदु B से 6 सेंटीमीटर दूर है, तब परकार की भूमिका स्वतः स्पष्ट हो जाती है। आधार रेखा के दूसरी ओर भी वैसा प्रतिच्छेदन मिल सकता है; उससे बना त्रिभुज पहले का प्रतिबिंब होगा और दोनों सर्वांगसम होंगे। इस चर्चा से माप, दूरी और सर्वांगसमता के बीच संबंध जुड़ता है। एक यांत्रिक क्रिया तर्कपूर्ण गणितीय अनुभव में बदल जाती है।

विद्यार्थियों से पूछा जा सकता है कि C को चापों के प्रतिच्छेदन पर ही क्यों चुना गया। जब वे समझते हैं कि A केंद्र वाले चाप का हर बिंदु A से 5 सेंटीमीटर दूर है और B केंद्र वाले चाप का हर बिंदु B से 6 सेंटीमीटर दूर है, तब परकार की भूमिका स्वतः स्पष्ट हो जाती है। आधार रेखा के दूसरी ओर भी वैसा प्रतिच्छेदन मिल सकता है; उससे बना त्रिभुज पहले का प्रतिबिंब होगा और दोनों सर्वांगसम होंगे। इस चर्चा से माप, दूरी और सर्वांगसमता के बीच संबंध जुड़ता है। एक यांत्रिक क्रिया तर्कपूर्ण गणितीय अनुभव में बदल जाती है।

रचना पूरी होने के बाद प्रत्येक समूह अपनी आकृति की तीनों भुजाएँ दोबारा मापे और दिए गए मानों से मिलाए। यदि माप में अंतर है, तो बच्चों को यह खोजने दिया जाए कि परकार की नोक खिसकी, स्केल तिरछा रखा गया, पेंसिल की रेखा बहुत मोटी थी या माप आरंभिक शून्य के बजाय किनारे से लिया गया। यहाँ गलती को असफलता मानने के बजाय जाँच का साधन बनाया जाता है। शिक्षक सही चित्र दिखाने से पहले विद्यार्थियों को सुधार का दूसरा अवसर दे सकते हैं। यह अभ्यास सूक्ष्मता, धैर्य और प्रमाण पर भरोसा करना सिखाता है।

एक अन्य गतिविधि में दो भुजाओं और उनके बीच के कोण का उपयोग होता है। विद्यार्थी AB = 6 सेंटीमीटर रेखाखंड बनाएँ, A पर 60 अंश का कोण बनाकर उसकी किरण पर AC = 5 सेंटीमीटर चिह्नित करें और फिर B को C से जोड़ दें। प्रश्न यह हो कि यहाँ पहले वाले दो चापों की जरूरत क्यों नहीं पड़ी। तुलना से वे पहचानते हैं कि दो भुजाएँ और उनके बीच का कोण मिलने पर तीसरे शीर्ष की स्थिति निर्धारित हो जाती है। इस उदाहरण को कागज की दो पट्टियाँ एक सिरे पर जोड़कर भी दिखाया जा सकता है, जिससे कोण बदलने पर आकृति कैसे बदलती है, यह तुरंत दिखाई देता है।

कोण-भुजा-कोण की स्थिति में 7 सेंटीमीटर का आधार AB लें। A पर 50 अंश और B पर 60 अंश की किरणें आधार की एक ही ओर बनाएँ। दोनों किरणें जहाँ मिलें, वही तीसरा शीर्ष C होगा और तीसरा कोण 70 अंश निकलेगा। फिर प्रश्न उठाया जा सकता है- यदि केवल तीन कोण दिए जाएँ, तो क्या निश्चित आकार का एक ही त्रिभुज मिलेगा? विद्यार्थी अलग-अलग बड़े और छोटे, पर समान कोणों वाले त्रिभुज बनाकर देख सकते हैं कि आकृति का आकार बदल सकता है। इससे वे समानता और सर्वांगसमता का अंतर समझने की ओर बढ़ते हैं।

गतिविधि को रुचिकर बनाने के लिए कक्षा में छोटे खोज-केंद्र बनाए जा सकते हैं। एक केंद्र पर पट्टियों से संभव और असंभव त्रिभुज की जाँच हो; दूसरे पर परकार से तीन भुजाओं की रचना; तीसरे पर चाँदे से दिए गए कोणों की रचना; और चौथे पर बने चित्रों की माप-जाँच। प्रत्येक केंद्र पर एक चुनौती-प्रश्न रखा जाए- जैसे 2, 3 और 6 सेंटीमीटर से आकृति क्यों नहीं बनी, अथवा चाप के दोनों प्रतिच्छेदन से बने त्रिभुज कैसे संबंधित हैं। बच्चे उत्तर लिखने के साथ अपनी खोज का छोटा चित्र भी बनाएँ।

यहाँ समूह में काम करना केवल सामग्री बाँटने का उपाय नहीं है; यह गणितीय भाषा सीखने का अवसर भी है। जब एक विद्यार्थी कहता है कि चाप यहाँ मिलना चाहिए, दूसरा पूछ सकता है कि ऐसा क्यों, और तीसरा स्केल से दूरी जाँच सकता है। इस संवाद में केंद्र, त्रिज्या, रेखाखंड, कोण, प्रतिच्छेदन और सर्वांगसम जैसे शब्द किसी शब्द-सूची से नहीं, वास्तविक काम के संदर्भ से जुड़ते हैं। शिक्षक विद्यार्थियों को अपना निष्कर्ष पूरे वाक्य में बोलने के लिए प्रेरित करें - जैसे "यह बिंदु दोनों केंद्रों से दी गई दूरी पर है।" इस तरह अवधारणा और अभिव्यक्ति साथ विकसित होती हैं।

सीखने की जाँच के लिए बड़ी परीक्षा आवश्यक नहीं। कक्षा के अंत में तीन छोटे प्रश्न पर्याप्त हो सकते हैं- क्या 3, 4 और 8 सेंटीमीटर से त्रिभुज बनेगा; 5, 6 और 7 सेंटीमीटर की रचना में दो चाप क्यों लगाए जाते हैं; और यदि एक चाप अपेक्षित बिंदु पर न मिले, तो सबसे पहले क्या जाँचना चाहिए। विद्यार्थी लिखित उत्तर, मौखिक व्याख्या या एक छोटा चित्र देकर अपना विचार स्पष्ट कर सकते हैं। इस आकलन में अंतिम आकृति के साथ तर्क, माप और सुधार की प्रक्रिया देखना अधिक उपयोगी होगा। वास्तविक सीखने का पता इन्हीं प्रमाणों से चलेगा।

इस पद्धति में विविध सीखने की जरूरतों को ध्यान में रखना भी आवश्यक है। जिन विद्यार्थियों को परकार पकड़ने में कठिनाई होती है, वे पहले मोटी कागजी पट्टियों या धागे से भुजाओं का संबंध समझ सकते हैं। दृष्टि-संबंधी जरूरतों के लिए उभरी हुई रेखाओं वाला बोर्ड, बड़े चिह्न और स्पर्श से पहचाने जा सकने वाले बिंदु उपयोगी हो सकते हैं। सीमित संसाधनों वाले विद्यालयों में भी समूह आधारित सामग्री तैयार की जा सकती है। यदि डिजिटल सुविधा उपलब्ध हो, तो गतिशील ज्यामिति के माध्यम से भुजाओं और कोणों के बदलने का प्रभाव देखना कागजी रचना का पूरक बन सकता है, उसका स्थानापन्न नहीं।

यह दृष्टिकोण समकालीन शैक्षिक दिशा से भी मेल खाता है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 में प्रत्यक्ष गतिविधियों और अनुभव-आधारित अधिगम को विषय-शिक्षण का महत्त्वपूर्ण आधार माना गया है [1]। राष्ट्रीय पाठ्यचर्या की रूपरेखा 2023 भी गणितीय समझ, तर्क और शिक्षार्थी की सक्रिय भागीदारी पर बल देती है [2]। किंतु इन दस्तावेजों का उद्देश्य तभी कक्षा में साकार होगा, जब गतिविधि केवल मनोरंजक प्रदर्शन बनकर न रह जाए। प्रत्येक सामग्री, प्रश्न और चर्चा को किसी स्पष्ट गणितीय विचार से जोड़ा जाना चाहिए। गतिविधि के बाद बच्चे क्या समझे और उसे नई स्थिति में कैसे उपयोग करते हैं, यही उसकी सार्थकता की कसौटी है।

"करके सीखना” का वास्तविक मूल्य इस बात में है कि विद्यार्थी त्रिभुज की रचना को याद किए गए निर्देशों की सूची के रूप में नहीं, समझे गए संबंधों की श्रृंखला के रूप में देखें। वे जानें कि कौन-सी तीन लंबाइयाँ संभव हैं, चाप कहाँ और क्यों मिलते हैं, कोण किस प्रकार तीसरे शीर्ष की दिशा निर्धारित करता है और त्रुटि होने पर जाँच कैसे की जाती है। जब हाथ का अभ्यास मन के तर्क से जुड़ता है, तो ज्यामिति का भय कम करने की संभावना बनती है। ऐसे नवाचार की सफलता का दावा केवल सुंदर चित्रों से नहीं, बल्कि बच्चों की स्वतंत्र व्याख्या, सही रचना और नए प्रश्न हल करने की क्षमता से किया जाना चाहिए

लेखक: - लक्ष्मी कांत शर्मा, शिक्षक,

शास. पूर्व माध्य. विद्यालय खपरीकला, डोंगरगांव, जिला राजनांदगाव (छ. ग.)



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